Home जिले Video: आखिर क्यों मनाई जाती है महाशिवरात्रि..जानिए इस पर्व से जुड़ी कथा...

Video: आखिर क्यों मनाई जाती है महाशिवरात्रि..जानिए इस पर्व से जुड़ी कथा और इसका महत्व..

दुर्गा प्रसाद सेन@बेमेतरा। एक साल में कुल 12 शिवरात्रि आती हैं। यानी कि हर महीने में एक शिवरात्रि। साल में आने वाली सभी शिवरात्रियों में से फाल्गुन मास में आने वाली महाशिवरात्रि का सबसे अधिक महत्व माना जाता है। महाशिवरात्रि का पर्व शिव भक्तों के लिए बेहद ही खास होता है। क्योंकि इस दिन को […]

आखिर क्यों मनाई जाती है महाशिवरात्रि..जानिए इस पर्व से जुड़ी कथा और इसका महत्व..

दुर्गा प्रसाद सेन@बेमेतरा। एक साल में कुल 12 शिवरात्रि आती हैं। यानी कि हर महीने में एक शिवरात्रि। साल में आने वाली सभी शिवरात्रियों में से फाल्गुन मास में आने वाली महाशिवरात्रि का सबसे अधिक महत्व माना जाता है। महाशिवरात्रि का पर्व शिव भक्तों के लिए बेहद ही खास होता है। क्योंकि इस दिन को शिव भगवान के जन्म के रूप में मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि एक बार भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद चल रहा था। तब उनके विवाद को सुलझाने के लिए भगवान शिव लिंग रूप में प्रकट हुए। एक दूसरी मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। इसलिए भी ये दिन खास हैं।

साल में आने वाली सभी शिवरात्रियों में से फाल्गुन मास में आने वाली महाशिवरात्रि का सबसे अधिक महत्व माना जाता है। इसके बाद सावन में आने वाली बड़ी शिवरात्रि शिव भक्तों के लिए काफी महत्वपूर्ण होती है। शिवरात्रि व्रत हर महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को रखा जाता है। माना जाता है कि शिवरात्रि के दिन मध्य रात्रि में भगवान शिव एक लिंग के रूप में प्रकट हुए थे। इसलिए शिवरात्रि की पूजा रात को करने का विशेष महत्व होता है।महाशिवरात्रि का इतिहास शिव पुराण की कथा के अनुसार एक बार ब्रह्माजी व विष्णुजी में विवाद छिड़ गया कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है। ब्रह्माजी सृष्टि के रचयिता होने के कारण श्रेष्ठ होने का दावा कर रहे थे और भगवान विष्णु पूरी सृष्टि के पालनकर्ता के रूप में स्वयं को श्रेष्ठ कह रहे थे।

तभी वहां एक विराट लिंग प्रकट हुआ। दोनों देवताओं ने सहमति से यह निश्चय किया गया कि जो इस लिंग के छोर का पहले पता लगाएगा उसे ही श्रेष्ठ माना जाएगा।अत: दोनों विपरीत दिशा में शिवलिंग की छोर ढूढंने निकले। छोर न मिलने के कारण विष्णुजी लौट आए। ब्रह्मा जी भी सफल नहीं हुए परंतु उन्होंने आकर विष्णुजी से कहा कि वे छोर तक पहुँच गए थे। उन्होंने केतकी के फूल को इस बात का साक्षी बताया। ब्रह्मा जी के असत्य कहने पर स्वयं शिव वहाँ प्रकट हुए और उन्होंने ब्रह्माजी की एक सिर काट दिया, और केतकी के फूल को श्राप दिया कि शिव जी की पूजा में कभी भी केतकी के फूलों का इस्तेमाल नहीं होगा।चूंकि यह फाल्गुन के महीने का 14 वा दिन था। जिस दिन शिव ने पहली बार खुद को लिंग रूप में प्रकट किया था। इस दिन को बहुत ही शुभ और विशेष माना जाता है और महाशिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है।

भगवान शिव ने अपनी पूजा में अक्षत के प्रयोग को महत्वपूर्ण बताया है। शिवलिंग के ऊपर अटूट चावल जरूर चढाएं। अगर संभव हो तो पीले रंग के वस्त्र में अटूट चावल सवा मुट्ठी रखकर शिवजी का अभिषेक करने के बाद शिवलिंग के पास रख दें। इसके बाद महामृत्युंजय मंत्र अथवा ओम नमः शिवाय मंत्र का जितना अधिक संभव हो जप करें। इस विधि से शिवलिंग की पूजा गृहस्थों के लिए शुभ माना गया है इससे आर्थिक समस्या दूर होती है।पहले त्रिपुंड, पूजा होगी अखंड भगवान शिव की पूजा में त्रिपुंड का विशेष महत्व है। भगवान शिव की पूजा करने से पहले चंदन या विभूत तीन उंगलियों में लगाकर सिर के बायीं ओर से दायीं ओर की तरफ त्रिपुंड लगाएं। बिना त्रिपुंड लेपन किए शिव का अभिषेक करना बहुत फलदायी नहीं होता है। भगवान का अभिषेक करने के बाद उन्हें भी त्रिपुंड जरूर लगाएं। इससे आरोग्य और प्रसन्नता की प्राप्ति होती है।शिवजी की पूजा में बेल के पत्तों का बड़ा ही महत्व है। बेल को साक्षात् शिव स्वरूप बताया गया है।

महाशिवरात्रि व्रत की कथा में बताया गया है कि एक शिकारी वन्य जीवों के डर से बेल के वृक्ष पर रात पर बैठा रहा और नींद ना आए इसलिए बेल के पत्तों को तोड़कर नीचे फेंकता रहा। संयोगवश उस स्थान पर शिवलिंग था। रात भर बेल के पत्ते उस शिवलिंग पर गिराते रहने से शिकारी के सामने भगवान शिव प्रकट हो गए और व्यक्ति मोक्ष का अधिकारी बन गया। शिव पुराण में कहा गया है कि तीन पत्तों वाला शिवलिंग जो कट फटा ना हो उसे शिवलिंग पर चढ़ाने से व्यक्ति पाप मुक्त हो जाता है। वैसे तो एक बेलपत्र अर्पित करने से ही भोलेनाथ प्रसन्न हो जाते हैं लेकिन संभव हो तो 11 या 51 बेलपत्र जरूर चढ़ाएं। महाशिवरात्रि के व्रत से एक दिन पहले ही पूजन सामग्री एकत्रित कर लें। लिंगपुराण में बिल्वपत्र को तोड़ने के लिए चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी, अमावस्या, संक्रांति काल एवं सोमवार को निषिद्ध माना गया है। शिव या देवताओं को बिल्वपत्र प्रिय हो…