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दंतेवाड़ा में जो आज हुआ वह एक इशारा है.. नौकरशाह और सियासतदानों के बीच आपसी तालमेल की कमीं का.. ! वक्त सामंजस्य का है लेकिन बिठाए कौन..?

अर्धेंदु मुखर्जी, संपादक मुख्यमंत्री भूपेश बघेल बस्तर के विकास को लेकर प्रतिबद्ध नजर आ रहे हैं, लिहाजा आज वे बस्तर दौरे पर थे। यहां उनके कई कार्यक्रम तय थे। लेकिन दंतेवाड़ा में हुए कार्यक्रम के दौरान कुछ ऐसा माहौल बना जो कई सवालातों को भी जन्म देता है। साथ ही सूबे की सियासत और नौकरशाह […]

दंतेवाड़ा में जो आज हुआ वह एक इशारा है.. नौकरशाह और सियासतदानों के बीच आपसी तालमेल की कमीं का.. ! वक्त सामंजस्य का है लेकिन बिठाए कौन..?

अर्धेंदु मुखर्जी, संपादक

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल बस्तर के विकास को लेकर प्रतिबद्ध नजर आ रहे हैं, लिहाजा आज वे बस्तर दौरे पर थे। यहां उनके कई कार्यक्रम तय थे। लेकिन दंतेवाड़ा में हुए कार्यक्रम के दौरान कुछ ऐसा माहौल बना जो कई सवालातों को भी जन्म देता है। साथ ही सूबे की सियासत और नौकरशाह के बीच आने वाले सामंजस्य पर भी कुठाराघात लगाता है। जाहिर है कुछ देर के लिए ही सही वहां का माहौल ऐसा निर्मित हो गया जिसकी छाप वहां मौजूद आम जनता पर बेहतर पड़े ऐसा नहीं कहा जा सकता।

दरअसल दंतेवाड़ा में नगर पालिका अध्यक्ष दीपक कर्मा और बस्तर आईजी विवेकानंद के बीच जो कुछ भी हुआ वह नहीं होना था क्योंकि नई सरकार है और इस सरकार को अभी लंबी डगर पार करना है।  वहां मौजूद तमामा आला आधिकारियों ने दीपक कर्मा को भी समझाने की कोशिश की लेकिन उसका असर होता दिखाई नहीं दिया। यहां तक की बात धमकी तक भी जा पहुंची।

सबसे पहले यह जान लेते हैं कि असल में वहां हुआ क्या था..? दरअसल मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के तयशुदा कार्यक्रम के मुताबिक उन्हें एक आमसभा को संबोधित करना था। सीएम की सुरक्षा की जिम्मेदारी बस्तर आईजी की थी। मुख्यमंत्री मंच में आने ही वाले थे इसी बीच आईजी विवेकानंद सिन्हा और नगर पालिका अध्यक्ष दीपक कर्मा के बीच कहासुनी हो गई। यह कहासुनी धमकी की शक्ल में आसपास मौजूद लोगों के लिए एक जिज्ञासा का सबब बनी रही।

सवाल ये नहीं है कि नेताजी ने आईजी को धमकाया। सवाल ये भी नहीं कि आईजी ने नेताजी के किस अहम को ठेस पहुचा दिया…? सवाल यहां यह उठाना लाजिमी है कि आखिर यह नौबत क्यों आई…? यहां यह बताना भी लाजिमी है कि दंतेवाड़ा जिले में शायद ही कोई ऐसा शख्स है जो कि कर्मा परिवार को ना जानता हो। फिर ऐसी क्या बात हो गई कि हालात ऐसे हो गए…? यह कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी कई बार ऐसा देखने को मिला है। फिलहाल सरकार कांग्रेस की है इसलिए इसे सीधा कांग्रेस से जोड़ा जाना उचित होगा, भाजपा के शासन में भी कई बार ऐसा देखने को मिला था।

इसलिए यह कहा जा सकता है कि सत्ता का नशा उनके कार्यकर्ताओं में होना स्वाभाविक है। पर ऐसे विवादों से बचा भी जा सकता है। अधिकारियों और नेताओं को इससे बचना चाहिए क्योंकि ऐसे हालात पैदा होना किसी भी दृष्टिकोण से ठीक नहीं है।