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15 HIV पीड़ित बच्चे जिन्हें मरहम के बजाय दिया जा रहा जख्म, हुए बेघर, एकमात्र संस्था की मान्यता रद्द

मनीष शरण@बिलासपुर.  जी हां ये सच है… 15 एचआईवी पीड़ित बच्चे जिन्हें प्यार और दुलार की बेइंतहां जरूरत है.. जिन्हें देखरेख की दरकार.. उन गुनाहों से जूझने की ताकत की दरकार है जिसे इन्होंने कभी किया ही नहीं। दूसरा सच ये भी है कि इनके जख्मों पर मरहम के बजाय उन्हें और जख्मों से नवाजा […]

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मरहम के बजाय दिया जा रहा जख्म

मनीष शरण@बिलासपुर.  जी हां ये सच है… 15 एचआईवी पीड़ित बच्चे जिन्हें प्यार और दुलार की बेइंतहां जरूरत है.. जिन्हें देखरेख की दरकार.. उन गुनाहों से जूझने की ताकत की दरकार है जिसे इन्होंने कभी किया ही नहीं। दूसरा सच ये भी है कि इनके जख्मों पर मरहम के बजाय उन्हें और जख्मों से नवाजा गया, इन्हें बेघर कर दिया गया। हम बात कर रहे हैं शहर की एक संस्था “अपना घर” की.. जिसकी मान्यता खत्म करने के साथ ही इन बच्चों की सारी उम्मीदों को ही खत्म कर दिया गया। बता दें कि यह सूबे की पहली ऐसी संस्था थी जहां ऐसे बच्चों की देखरेख के साथ ही उन्हें बेहतर परवरिश दी जाती थी।

कौन सही कौन गलत… ? खबर छत्तीसी का मकसद यह साबित करना नहीं ..बस हम उन एचआईवी पीड़ित बच्चों का दर्द  महसूस करने की कवायद कर रहे हैं जिन्हें नियमों  की बंदिशें नहीं बल्कि प्यार और दुलार की दरकार है।

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर में संचालित “अपना घर” नाम की संस्था की मान्यता रद्द कर दी गई है। यह वह संस्था है जहां एचआईवी पीड़ित 15 बच्चियां रहती हैं। अब इन बच्चों को महिला बाल विकास के माध्यम से बाल संप्रेषण गृह भेजा जा रहा है। जिसका संस्था के संचालक और बच्चे भी विरोध कर रहे हैं। 1 से 17 वर्ष की इन बच्चियों को एचआईवी के अलावा और भी कई गंभीर बीमारियां हैं। ये बच्चियां मिर्गी, टीवी, सिफलिस और मंदबुद्धि जैसी समस्या से ग्रसित है।

इतना ही नहीं उनके पास केवल अगले 2 दिनों के लिए दवाइयां उपलब्ध है। एचआईवी और ट्यूबरक्लोसिस की दवाई में अगर बीच में रोक दी जाए तो बच्चों की सेहत गंभीर हो सकती है। ऐसे में संस्था के संचालक संजीव ठाकुर ने अधिकारियों पर कमीशन खोरी का आरोप लगाया है। संचालक के इन आरोपों के उलट विभागीय अधिकारी सुरेश सिंह ने स्पष्ट किया कि जो भी कार्रवाई उन पर हुई है। वह पूरी तरह नियम और कायदे कानून को ध्यान पर रखकर की गई है । ऐसे में इस तरह के आरोप पूरी तरह से बेबुनियाद और झूठे हैं।

 

इधर एचआईवी पीड़ित इन बच्चों ने जिला कलेक्टर और दंडाधिकारी के सामने खड़े होकर अपनी फरियाद सुनाई है। इनकी मांग है कि, इन बच्चों को जहां वह पहले रह रहे थे, उन्हें रहने दिया जाए। वही समाजिक संगठन भी अब इन बच्चों क साथ मदद के लिए सामने आ रहे हैं। सुनें क्या कह रही हैं सामाजिक कार्यकर्ता प्रियंका शुक्ला…

सुनें मामले को लेकर क्या है अपर कलेक्टर वीसी साहू की दलील…

बता दें कि सभी बच्चे स्कूलों की पढ़ाई करते हैं इनकी मेडिकल स्थिति ऐसी नहीं है कि इन्हें किसी बाल संप्रेषण की में रखा  लिहाजा जिला प्रशासन और उनके अधिकारियों ने फिलहाल संस्थान और उनके इन फरियादी बच्चों को थोड़ी राहत दी है और अब यह अपने परीक्षा समाप्त होने तक अपने पुराने संस्थान में रह सकते हैं।

बता दें कि एचआईवी पीड़ित बच्चियों ने पिछले दिनों अपनी हाथ की नस काटकर आत्महत्या की कोशिश की थी। इस मामले ने सियासी रंग भी लिया लेकिन सवाल उठना लाजिमी है कि क्या नियम और कायदे मानवीय संवेदनाओं से बढ़कर है..?